PeepingMoon Exclusive:  क्या 'दिल बेचारा', 'गुंजन सक्सेना' जैसी फिल्मों को हिट और फ्लॉप में क्लासिफाइड करना चाहिए?  ट्रेड एनालिस्ट्स ने रखी अपनी राय 

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कोरोना महामारी ने भारत में फिल्म बिजनेस की गतिशीलता को बदल दिया है. मार्च के एंड से पूरे देश में थिएटर्स बंद हैं और इस बात पर कोई  स्पष्टता नहीं है कि अभी थिएटर्स फिर से कब खुलेंगे. इस संकट के बीच असाधारण परिस्थितियों के कारण, फिल्ममेकर्स अपनी फिल्मों की शूटिंग और तैयार होने के लिए अन्य रेवन्यू तलाश रहे हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने अब तक ओटीटी प्लेटफार्म्स पर करीब दस बड़ी फिल्मों का प्रीमियर किया है और आने वाले टाइम में कई बड़ी फिल्में कतार में खड़ी है. जिसमें 'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया' और 'लक्ष्मी बॉम्बे' जैसी बड़ी फिल्में भी शामिल हैं. वहीं अगले कुछ महीनों में कई बड़ी फिल्मों के OTT पर रिलीज के शेड्यूल सामने आने वाले हैं.
 

हालांकि, डिजिटल रिलीज़ में एक फिल्म के परफोर्मेंस को ट्रैक करने के लिए बॉक्स ऑफिस सिस्टम नहीं है, इसके विपरीत थिएटर रिलीज़ जो बड़े पैमाने पर इसके बॉक्स ऑफिस संग्रह द्वारा मापा जाता है...तो बॉक्स ऑफिस और टिकट खिड़कियों पर उन लंबी कतारों की अनुपस्थिति में, एक ओटीटी फिल्म की सफलता और विफलता को नापने के लिए कौन से पैरामीटर हैं? अगर कोई फिल्म जो वैश्विक (ग्लोबल) स्तर पर ऑनलाइन रिलीज होती है, उसका इवेलुएट एक हिट या एक फ्लॉप कैसे होगा?

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वहीं इस पर बॉलीवुड ट्रेड एनालिस्ट और सुपर सिनेमा मैगजीन के एडीटर अमूल विकास मोहन कहते हैं कि, 'हमारे पास अभी कोई भी बैरोमीटर नहीं है जो फिल्म के हिट या फ्लॉप को आसानी से बता पाए. लेकिन हां सोशल मीडिया पर लोगों की बातचीत के पता चलता है कि ओटीटी पर फिल्म अभी कितने सप्ताह तक चल रही है.' वहीं मोहन की बात से सहमत होकर फिल्म समीक्षक कोमल नाहटा कहते हैं कि, 'एकमात्र इसी तरीके से पता चलता है कि 3-4 हफ्ते में स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर फिल्म देखने वालों की संख्या में कितना इजाफा हुआ.'

सुपर सिनेमा मैगजीन के एडीटर अमूल विकास मोहन आगे कहते हैं कि, 'अनफॉर्चूनेटली, ओटीटी नंबर्स शेयर करने के लिए तैयार नहीं हैं. अपनी ग्लोबल पॉलिसी के तहत वो इसका कड़ाई से पालन करते हैं, OTT प्लेटफॉर्म उन लोगों की संख्या के बारे में डेटा जारी नहीं करता है जिन्होंने किसी विशेष कंटेंट को देखा है. किसी भी फिल्म को हिट या फ्लॉप घोषित करने के लिए कितने व्यूज मिलने चाहिए, इसके बारे में कोई मापदंड तय नहीं किया गया है. यहां तक​कि अगर ओटीटी प्लेटफ़ॉर्मर्स व्यूअरशिप के आंकड़े जारी करता भी हैं, तो हमें यह नहीं पता नहीं चलेगा कि कितने लोगों ने पूरी फिल्म देखी या इसे 15 मिनट के बाद रोक दिया. इसमें रिजेक्ट या एक्सेप्ट शब्द भी गलत है क्योंकि अगर हम कहते हैं कि इस फिल्म को एक्सेप्ट कर लिया गया है तो इसका मतलब हुआ ये फिल्म 'हिट' है...लेकिन असल में फिल्म की हिट होने का पता ही नहीं लगता है.'

तो क्या कोई तरीका नहीं है कि हम सीधे ओटीटी पर जारी फिल्म की सफलता और विफलता का पता लगा सकें? जिस पर फिल्म समीक्षक कोमल नाहटा ने पूरे मामले पर पीपिंग मून से खास बातचीत में कहा कि, 'एकमात्र तरीका लोगों की रिपोर्ट्स पर ही निर्भर करता है. जिन्होंने फिल्म को प्लेटफॉर्म पर देखा है और सोशल मीडिया पर अपनी राय बता रहे हैं. हमें केवल वर्ड ऑफ माउथ यानी WOM से जाना होगा'

ओटीटी रिलीज और प्रामाणिक आंकड़ों की कमी से सैटेलाइट रेवन्यू को भी प्रभावित किया है. कोरोना के मद्देनजर मार्च में हुए लॉकडाउन के बाद से ही सभी सिनेमाघर बंद हैं. सैटेलाइट्स की कीमतें फिल्म के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के आधार पर तय होती हैं. जैसे अगर कोई फिल्म हिट हो जाती है, तो उसके बाद सैटेलाइट के राइट्स के प्राइस तय किए जाते हैं. 

हालांकि, यह ओटीटी फिल्मों के साथ नहीं हो रहा है, जो एक फिक्स प्राइज पर बेची जाती हैं, ताकि किसी भी तरह का रेवन्यू प्राप्त न हो...तो ओटीटी फिल्मों के लिए सैटेलाइट सौदे कैसे हो रहे हैं जब इसकी सफलता और विफलता को मापने के लिए कोई मानक मीट्रिक नहीं है? इस पर फिल्म निर्माता और प्रख्यात ट्रेड एनालिस्ट गिरीश जौहर का कहना है कि, 'ओटीटी अधिग्रहण में एक पैरामीटर नहीं है, इसलिए OTT फिल्मों की किमत फिल्मों के बजट, एक्टर्स की पिछली रिलीज़, पूरे सेटअप के बजट पर आधारित हैं'
 

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