'Gunjan Saxena: The Kargil Girl' Review: कारगिल युद्ध की इस वीर गाथा में जान्हवी कपूर ने भरी ऊंची उड़ान

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फिल्म - गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल
कास्ट - जान्हवी कपूर, पंकज त्रिपाठी, विनीत कुमार, अंगद बेदी, मानव विज, आयेशा रज़ा मिश्रा 
डायरेक्टर : शरण शर्मा 
निर्माता : धर्मा प्रोडक्शन और जी स्टूडियोज
डिस्ट्रिब्यूटर - नेटफ्लिक्स
रेटिंग :  4 मून्स

बॉलीवुड की कारगिल की जंग पर फिल्में बनाने का मोह पुराना है लेकिन शरण शर्मा की 'गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल' उन वॉर फिल्मों से बिलकुल अलग है. जहां हमने 1999 के भारत पाक युद्ध के ऐतिहासिक लम्हे देखे हैं. 'गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल' तो एक बांध कर रखने वाली सच्ची कहानी हैं. जहां आप देखते हैं कि कैसे 1999 के कारगिल वॉर में पुरुषों से भरे भारतीय वायुसेना के सबसे मुश्किल ऑपरेशन को अपने कंधे पर उठाने का जिम्मा लेता ही फ्लाइट लेफ्टिनेंट जांबाज लड़की गुंजन सक्सेना. 
गुंजन की भूमिका में जान्हवी कपूर विश्वसनीय लगती हैं हैं. जीवनभर एक नर्म और दब्बू किस्म की लड़की के तौर पर जिंदगी जीने वाली गुंजन को दर्शक कई स्तर पर देखते हैं. पहला जहां वो भारतीय वायुसेना में हेलिकॉप्टर पायलट बनने के लिए  शारीरिक, मेडिकल और दिमागी परीक्षाओं की चुनौती पार करती है. फिर इस दौरान कैसे आधी रात को अपमान, अन्याय और चोट झेलने के बाद उधमपुर एयरबेस छोड़ लखनऊ आकर अपने पापा (पंकज त्रिपाठी) के कंधे पर रोती है. वहीं दूसरी तरफ  युद्ध के लिए कॉल आते ही उसकी आंख में आप एक फौलादी चमक देखते हैं और एक दर्शक के तौर पर आपकी भी आंखे चमकती हैं. जब आप गुंजन सक्सेना को अपने फ्लाइट सूट में चीता हेलिकॉप्टर के साथ कारगिल घाटी में शौर्य का प्रदर्शन करते देखते हैं.

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पायलट बनने का सपना गुंजन ने तब देखना शुरु किया था जब उसे बचपन में पहली बार कमर्थियल प्लेन के कॉकपिट में जाने का मौका मिला था. लेकिन उसका सैनिक भाई ( अंगद बेदी) उससे कहता कि लड़किया पायलट नहीं एयरहोस्टेस ही बन सकती हैं जबकि उसके इस सपने में उसका साथ देते उसके पिता और कहते कि प्लेन चाहे लड़का उड़ाए या लड़की दोनों कहते पायलट ही हैं. बस पिता के इसी साथ ने गुंजन के सपनों को पंख दे दिए. 

वो लड़की जो एविएटर ग्लासेज पहन कागज और खिलौने के जहाज उड़ाती थी वो बड़ी होते होते अपने जुनून को और पैशन से जीने लगती है. पिता तो चाहते हैं कि बेटी पायलट बने लेकिन दिल्ली फ्लाइंग स्कूल की मंहगी फीस और 5 साल के कोर्स के आगे मजबूरी खड़ी होती है. ऊपर से मां ( आयेशा रजा मिश्रा) और भाई ( अंगद बेदी) दोनों ही इस बात के लिए राजी नहीं होते. लेकिन किस्मत गुंजन का दरवाजा तब खटखटाती है जब भारतीय वायुसेना अपनी पहली महिला पायलट बैच का विज्ञापन देती है. पिता परिवार को समझाते हैं कि जब देश सेवा हमारे परिवार के खून में है तो गुंजन क्यों नहीं कर सकती जबकि भाई का तर्क है कि सेना औरतों के लिए नहीं है और भाई होने के नाते उसे बहन की सुरक्षा की ज्यादा परवाह करनी है न कि उसकी खुशी की.

लेकिन गुंजन कर दिखाती है और एक इंडियन एयरफोर्स पायलट बनने के लिए उसमें जो खूबियां दिखाई गई हैं और जो ट्रेनिंग के सीन हैं कमाल के फिल्माए हैं. लेकिन मेडिकल फिटनेस के पैमानों पर गुंजन को उस वक्त बाहर होना पड़ता है जिसके बाद उसके पिता उसे अपने स्तर पर ट्रेनिंग देते हैं और उसमें हौसला भरते हैं और कहते हैं कि भारतीय सेना को जोश से भारत माता की जय बोलने वालों से ज्टादा ईमानदार, मेहनती और गंभीर देशभक्तों की जरूरत है और आखिरकार गुंजन भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनती है.
 

फिल्म में एयरफोर्स पायलट बनने के दौरान गुंजन सक्सेना के सामने आई चुनौतियों को फिल्म बखूबी दिखाती है जो कई मौकों पर आपको इमोशनल कर देगा. मानसिक शोषण से लेकर अधिकारियों और साथ काम करने वालों बर्ताव के साथ ही एक सैनिक के मन की बात को फिल्म शानदार ढंग से पेश करती है. इस बर्ताव और शोषण से गुंजन इस कदर टूट जाती है कि आखिरकार उधमपुर बेस छोड़ घर लौट आती है लेकिन कारगिल युद्ध उसे एक बार फिर अपने कर्तव्य की याद दिलाता है और जब उसे समन भेजा जाता है युद्ध में शामिल होने के लिए ताकि युद्ध में फंसे अपने घायल साथियों और सेना की रणनीति के हिसाब से वो मदद कर सके तो वो एक पल के लिए सोचती नहीं है और जब जंग के मैदान में चीता हेलिकॉप्टर के साथ अपना शौर्य दिखाती है तो सलाम किए बिना आप नहीं रह पाते हैं.

फिल्म में जो कमी है वो सिर्फ इतनी है कि यहां आपको युद्ध के मैदान पर गुंजन सक्सेना के शौर्य की बस एक कहानी दिखाई जाती है जबकि असल में गुंजन ने 24 साल की उम्र में उस युद्ध भूमि पर 40 मिशन को अंजाम दिया था जिसमें घायल सैनिकों को निकालने से लेकर, ट्रांसपोर्ट सप्लाई और सर्विलांस तक की मदद शामिल थी. जान्हवी कपूर ने अपनी एक्टिंग से फिल्म को अपने कंधों पर उठा रखा है. ये एक ऐसा रोल था जहां उन्हें अपने इमोशन को कंट्रोल करना था और ये काम उन्होने बखूबी किया है. गुंजन सक्सेना की कहानी कारगिल की बड़ी युद्ध की कहानियों में कहीं दबी रह गई थी जिसे जान्हवी की परफॉर्मेंस ने अपने तरह से ट्रिब्यूट दिया है. 

छोटी मगर असरदार भूमिका में पंकज त्रिपाठी लाजवाब हैं तो मानव विज ने ने भी शानदार काम किया है. अगंद बेदी और आएशा रजा मिश्रा के रोल एक स्ट्रॉन्ग सपोर्ट देते हैं. हालांकि अरिजीत सिंह, सुखविंदर सिंह, रेखा भारद्वाज और अमाल मलिक के गीत कुछ खास प्रेरणा नहीं भरते मगर आर. डी का कैमरा वर्क आपके रौंगटे खड़े खर देगा. खासकर हेलिकॉप्टर वाले दृश्यों में. तो तैयार हो जाइए, अपनी कुर्सी की पेटी बांध लीजिए क्योंकि गुंजन सक्सेना की जिंदगी किसी दमदार शौर्य की कहानी से कम नहीं.

पीपिंगमून की तरफ से  'गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल' फिल्म को 4 मून्स

(Transcripted By: Varsha Dixit)

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