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जॉन अब्राहम बोले- पीएम मोदी जरूर करेंगे इस फ‍िल्‍म को पसंद

'परमाणु: द स्टोरी ऑफ पोखरण' फिल्म को प्रड्यूस करने वाले जॉन अब्राहम के प्रॉडक्शन हाउस और फिल्म निर्माण में शामिल दूसरे प्रॉडक्शन हाउस के बीच लड़ाई अब खुलकर सामने आ गई है. ये लड़ाई जॉन फ‍िल्‍म को बचाने के लिए कर रहे हैं. आलम यह है कि दोनों ही एक-दूसरे पर खुलकर आरोप लगा रहे हैं. पिछले दिनों जारी एक पब्लिक नोटिस में जॉन के प्रॉडक्शन हाउस ने कहा था कि उन्होंने फिल्म के लिए सहयोगी प्रॉडक्शन हाउस के साथ सभी अग्रीमेंट कैंसल कर दिए हैं, लेकिन सहयोगी प्रॉडक्शन हाउस ने इसे गलत और अवैध बताया था.

जॉन अब्राहम फिल्म्स और क्रिअर्ज एंटरटेनमेंट प्रस्तुति फिल्म ‘परमाणु: द स्टोरी ऑफ पोखरण’ 4 मई, 2018 को रिलीज होने जा रही है. इस फिल्म की रिलीज को लेकर हाल ही में इसके प्रोड्यूसर्स जॉन अब्राहम और प्रेरणा अरोड़ा आपस में उलझ पड़े. बात इतनी बढ़ गई कि जॉन की ‘जेए फिल्म्स’ ने क्रिअर्ज एंटरटेनमेंट को सार्वजनिक तौर पर एक लीगल नोटिस भी भेज दिया. इस मामले के प्रकाश में आने के बाद आज इस फिल्म के रिलीज डेट की घोषणा की गई.

अपने लीगल नोटिस में जॉन अब्राहम की ‘जेए फिल्म्स’ ने क्रिअर्ज एंटरटेनमेंट के खिलाफ एक नोटिस जारी करते हुए इल्जाम लगाया कि क्रिअर्ज ने उनके पेमेंट्स अब तक रुकवा रखे हैं. इसी के साथ क्रिअर्ज एंटरटेनमेंट 'जेए फिल्म्स' के साथ न तो ‘परमाणु’ की डिस्ट्रीब्यूशन प्लान को लेकर चर्चा कर रही है और ना ही इसकी प्रमोशनल स्ट्रेटेजी पर ध्यान दे रही है. बजाए इसके क्रिअर्ज ने मीडिया में इस फिल्म की रिलीज को बार-बार स्थगित करने को लेकर झूठी बयानबाजी की है.

ये इंटरव्‍यू क्रि‍अर्स मामले से एकदम अलग है. इसमें जॉन की आने वाली फ‍िल्‍म 'परमाणु' के बारे में सारी ड‍िटेल्‍स हैं...

सवाल: कृअर्ज एंटरटेनमेंट के साथ जाने का फैसला आपने क्यों किया?
जवाब: नैतिक रूप से अगर मैं कहूं, तो कृअर्ज एंटरटेनमेंट के साथ 'परमाणु' करने का मैंने फैसला इसलिए किया क्यूंकि प्रेरणा अरोड़ा और अर्जुन कपूर वो पहले शख्स थे जिन्होंने मेरे साथ भागीदारी करने में रुचि दिखाई. हां, इसके अलावा और स्टूडियोज़ भी थे, लेकिन मैंने कृअर्ज को ही चुना.

सवाल: अपवादों को छोड़ दें, तो आप उन्हें क्या बताना चाहते हैं?
जवाब: उन्हें नहीं पता है कि इसकी कहानी असल में है क्या. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. उनकी मार्केटिंग टीम ने 'परमाणु' देखी और और इसे बहुत पसंद किया है. वो भी यही कहते हैं कि प्रेरणा और अर्जुन को पता नहीं है कि वो क्या खो रहे हैं. लेकिन सच कहूं, तो वो बतौर निवेशक आए थे, और उन्हें फिल्म से कोई रचनात्मक या भावनात्मक लगाव नहीं था. और वो उसी तरीके से पूरी प्रक्रिया में रहे.

सवाल: तकनीकी रूप से देखा जाए, तो आपने 'परमाणु' खुद ही बनाई है?
जवाब: शुरुआत से लेकर आखिर तक. मैंने ही इसका लाइन प्रोडक्शन संभाला. हमने सबसे कठिन परिस्थितियों में भी शूटिंग करते हुए 'परमाणु' की शूटिंग दो दिन पहले ख़त्म कर दी. यह एक जबरदस्त अनुभव रहा. मेरा इस फिल्म पर अधिकार है, और इस पर अधिकार जताते हुए मैं गर्व महसूस करता हूं. 'परमाणु' के किसी भी काम में कभी देर नहीं हुयी. सिवाय पेमेंट्स के! मुझे नहीं पता कि कृअर्ज एंटरटेनमेंट के साथ कोई थर्ड पार्टी भी जुड़ी हुयी है या नहीं. मुझे ज़ी स्टूडियोज और केवाईटीए प्रोडक्शंस के साथ का कोई एग्रीमेंट नहीं दिखाया गया है. हालांकि जेए एंटरटेनमेंट इस फिल्म पर 50 प्रतिशत मालिकाना हक़ रखता है. लेकिन मुझे ख़ुशी होगी अगर ज़ी स्टूडियोज और केवाईटीए प्रोडक्शंस भी आगे आएं जब तक वो मेरे साथ डील कर रहे हैं. मैं, बतौर जॉन अब्राहम और जेए एंटरटेनमेंट, बिलकुल नहीं चाहता कि मेरी फिल्म के ऊपर किसी का भी आर्थिक नुकसान हो.

सवाल: आप फिल्म से खुश हैं?
जवाब: बहुत खुश. और राहत में हूं. आत्मविश्वास से भरा हुआ हूं क्यूंकि मैंने यह फिल्म इंडस्ट्री के अंदर के और बाहर के कई लोगों को दिखाई है. सभी ने फिल्म न सिर्फ बेहद पसंद की है, बल्कि यहां तक कहा है कि यह मेरा अब तक का बेस्ट काम है. यह बहुत थ्रिलिंग फिल्म है. महज़ 15 मिनट के बाद ही लोग अपनी अपनी सीटों से चिपके रहेंगे. यह 2 घंटे के अंदर की फिल्म है और मज़ेदार है. यह डाक्यूमेंट्री फिल्म की तरह नहीं है.

सवाल: परमाणु सत्य पर कितनी प्रामाणिक है?
जवाब: हमारे देश में परमाणु जासूसी पर पहले कभी कोई फिल्म नहीं बनी है. अभिषेक पोखरण टेस्ट्स पर करीब दो साल से रिसर्च कर रहे थे. लेकिन फिर हम उन असली खिलाड़ियों से मिले जो असल में उन टेस्ट्स का हिस्सा थे. उनमें से कुछ ने हमारे सेट का जायज़ा भी लिया. कुछ रिटायर हो चुके हैं, न सिर्फ इंडियन आर्मी से, बल्कि इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन (इसरो), इंटेलिजेंस ब्यूरो, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क), डिफेन्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट
आर्गेनाईजेशन (डीआरडीओ) आदि से भी. वो सभी संतुष्ट थे कि हम जो भी फिल्म में दिखा रहे हैं वो सब वास्तविक है. सभी कुछ सत्य घटनाओं पर आधारित है. हमने सिर्फ नामों में बदलाव किये हैं. फिल्म में जो एकमात्र काल्पनिक किरदार है, वो मेरा है. "मद्रास कैफ़े" कि तरह. हम उस शख्स से मिले जिसने बम बनाया था. मैं उन सब लोगों के नाम फिल्म के अंत में स्क्रीन पर देकर उन्हें वो आदर और सम्मान देना चाहता था जिसके वो हकदार हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि हम उनका नाम इस्तेमाल न करें क्यूंकि उस मिशन को गूढ़ रीति से अंजाम दिया गया था. जो जानकारी हम आपको दे रहे हैं वह पवित्र है.

सवाल: लेकिन आपने सरकारी अनुमति ली थी?
जवाब: जी हां, हमने फिल्म की शूटिंग असली पोखरण न्यूक्लियर टेस्ट साइट पर की है. और मैंने फिल्म की स्क्रिप्ट उन सभी राजनीतिक लोगों के साथ शेयर की जो उस समय टेस्ट में किसी न किसी तौर पर शामिल थे. उन सभी ने फिल्म को काफी पसंद किया. उन्होंने हमें कुछ बदलाव करने के सुझाव दिया जिन्हें हमने ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार किया.

सवाल: अब आगे क्या?
जवाब: मैं हर छात्र को और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को 'परमाणु' दिखाना चाहता हूं. श्री नरेंद्र मोदी को इसलिए नहीं कि वो प्रधानमन्त्री हैं, बल्कि इसलिए क्यूंकि वो भारतीय हैं.

सवाल: करियर के इस मुकाम पर आकर आपने ‘परमाणु’ जैसा सब्जेक्ट क्यों चुना?
जवाब: मैं मानता हूं कि आज का जो ये युवा है, उसे अपने भारतीय होने पर बहुत गर्व है. एक समय था जब हम खुद को दूसरे देशों के मुकाबले कहीं पिछड़ा हुआ समझते थे. इंडियन पासपोर्ट के साथ एक शर्मिंदगी लगती थी. लेकिन आज ऐसा नहीं है. आज का यूथ मानता है कि भारत एक महान देश है. और इसके महान होने के पीछे 11 मई 1998 की तारीख का बहुत बड़ा हाथ है. इस तारीख को बुद्ध पूर्णिमा का दिन रहा है. बुद्ध इस दिन मुस्कुराए थे. और हमने इस दिन परमाणु परीक्षण किया. इसकी महत्ता यह रही कि उस परीक्षण के बाद से पूरी दुनिया को यह पता चला कि भारत भी दमखम रखने वाला देश है और इससे उलझना ठीक नहीं रहेगा. इतिहास को देखा जाए तो इंडिया एक अहिंसावादी देश रहा है. तो यह परीक्षण कोई न्यूक्लियर बम बनाने के लिए नहीं था. बल्कि यह प्रयोग स्वयं को परमाणु ऊर्जा से संपन्न बनाए रखने के लिए था. इसलिए यह इवेंट भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर था. और इसकी कहानी तो सबको पता चलनी चाहिए. हमने अपने भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के ऊपर ‘मद्रास कैफे’ बनाई थी. ऐसे ही कई
कहानियां हैं जिन्हें मैं समझता हूं कि युवाओं को जानना चाहिए. और आप देखिएगा कि इस ऑडियंस का एक हिस्सा ऐसा भी होगा जो इस फिल्म को देखकर बहुत गर्व महसूस करेगा.

सवाल: जब ये असली परमाणु परीक्षण हुआ था तब आप क्या कर रहे थे और उस समय आपकी इस पर क्या प्रतिक्रिया थी?
जवाब: मैं उन दिनों अपना एमबीए कर रहा था. मुझे बहुत बुरा लगता है जब मैं किसी से पूछता हूं कि 1998 में क्या हुआ था और लोग जवाब नहीं दे पाते. ठीक ऐसा ही ‘मद्रास कैफे’ के टाइम पर भी मेरे साथ हुआ है. कई ऐसी चीजें है जो आज की यंग ऑडियंस को पता ही नहीं हैं. लेकिन मेरी हमेशा से ही पॉलिटिकल सब्जेक्ट्स को पढ़ने में रुचि रही है. तो अगर आप मुझसे पूछेंगे कि आजकल सीरिया में क्या हो रहा है, या वेनेजुएला में क्या हो रहा है या जापान और नॉर्थ कोरिया में क्या हालात हैं, तो मैं शायद बता सकता हूं क्यूंकि मैं दुनिया भर के बारे में पढ़ता रहता हूं. तो मैं 1998 का भी आपको बता सकता हूं. मैं उन दिनों न्यूज देख रहा था और मुझे याद है कि उस टाइम पर कुछ पत्रकार एक किसान के पास कुछ सवाल पूछने आए. वो टेस्ट अंडरग्राउंड हुआ था. तो उन लोगों ने उस किसान से पूछा, ‘इस टेस्ट से तो आपके घर में दरारें आ गईं. इस बारे में आप क्या कहेंगे?’ तो उस किसान ने जवाब दिया था, ‘घर टूट गया तो क्या हुआ साहब…देश तो बन गया न’. ऐसे देशभक्ति के जज्‍बे को सलाम है और ऐसी कहानियां तो सालों तक सबको सुनानी चाहिए.
इसलिए मैंने यह फिल्म बनाई है.

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