PeepingMoon Exclusive: 'आज तक हैदराबादी लैंग्वेज में कोई भी लव स्टोरी नहीं बनी है, बोलो हाऊ का टेस्ट और फील अलग है' : फिल्ममेकर तरुण धनराजगिर

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1970 के दशक के जाने-माने मॉडल और एक्टर तरुण धनराजगिर ने साल 2010 में आई फिल्म 'किस हद तक' से डायरेक्शन में डेब्यू किया था. तरुण धनराजगिर 1985 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले प्राइड एंड प्रेजुडिस के भारतीय रीमेक में मिस्टर डार्सी के किरदार के लिए याद किया जाता है. थिएटर की दुनिया में बड़े पैमाने पर काम करने के बाद, तरुण ने हेमा मालिनी के साथ 'तेरह पन्ने' और पल्लवी जोशी के साथ 'आरोहण' जैसे हिट टीवी शोज में भी काम किया है. वहीं अब तरुण अपनी अपकमिंग फिल्म  'बोलो हाऊ' से कमबैक कर रहे हैं. ये फीचर फिल्म 15 जनवरी को थिएटर्स में रिलीज हो रही है. 'बोलो हाऊ' हैदराबादी तड़के के साथ एक मजेदार लव स्टोरी है. इस फिल्म से तरूण की बेटी जाह्नवी धनराजगिर अपना बॉलीवुड में डेब्यू करने जा रही हैं. वहीं फिल्म में अंकित राठी भी लीड रोल में है. वहीं  तरुण धनराजगिर ने पीपिंगमून के साथ खास बातचीत. इस दौरान  तरुण ने अपनी फिल्म के साथ साथ अपनी जर्नी पर भी बात की. 

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सवाल- 'बोलो हाऊ’ के बारे में बताइए..जिसमें हैदराबादी तड़का होगा..और हम सभी जानते हैं कि हैदराबादी अंदाज में डायलॉग्स कितने मजेदार होते हैं ?
जवाब- यह एक बहुत प्यारी लव स्टोरी है. हैप्पी लव स्टोरी है. यह एक पूरी फैमिली एंटरटेनर फिल्म. आप पूरे परिवार के साथ बैठकर यह फिल्म देख सकते हैं. हमारी फिल्म के गाने बहुत अच्छे हैं.मेलोडी पर बहुत काम किया गया है. फिल्म में प्यार को बहुत खूबसूरती से दिखाने की कोशिश की गई है. जैसा कि आजकल की फिल्मों में रोमांस की परिभाषा बदल गई है, मतलब जैसे प्यार में छेड़छाड़ ज्यादा हो गई है, लड़का लड़की को खींच रहा है धकेल रहा है, यह सब सही मायनों में प्यार की परिभाषा नहीं है. मुझे ऐसा लगता है प्यार में नजाकत होनी चाहिए, आंखों में प्यार दिखना चाहिए. फिल्म का सब्जेक्ट तो बहुत प्यारा है ही साथ ही हैदराबाद का माहौल, मतलब सोने पर सुहागा हो गया. मैं बस आपसे इतना ही कहूंगा लव स्टोरी तो लव स्टोरी होती है जैसे लड़का लड़की मिलते हैं प्यार हो जाता है फिर कुछ ना कुछ प्रॉब्लम हो जाती है और एंड में या तो वह दोनों एक दूसरे से मिल जाते हैं या मर जाते हैं. हर लव स्टोरी का कांसेप्ट एक ही होता है बस उसको कहने का तरीका अलग होता है. हमने फिल्म के सीन्स और इमोशंस पर बहुत काम किया है. हमने यह कहानी बनाते हुए सोचा था कि इसको हम हैदराबादी टच देते हैं, क्योंकि आज तक हैदराबाद की लैंग्वेज में कोई भी लव स्टोरी नहीं बनी है. यह एक टिपिकल हैदराबादी फिल्म है. फिल्म के सारे कैरेक्टर को बहुत ही बेहतर ढंग से लिखा गया है. हम भी फिल्मी गाने भी हैदराबादी लैंग्वेज में रखे हैं. आपको फिल्म देख कर बहुत मजा आएगा. हमने पूरी कोशिश की है कि फिल्म को बेस्ट बनाएं


सवाल
आपकी बेटी जाह्नवी धनराजगिर  'बोलो हाऊ’ फिल्म से डेब्यू कर रहीं है. अंकित राठी भी काफी टैलेंटेड एक्टर है. कैसा रहता था सेट का माहौल ? दोनों ही कलाकार हैदराबाद से नहीं है तो भाषा की पकड़ में कोई दिक्कत आई ? 

जवाब- सेट का माहौल बहुत मजेदार रहता था. मेरा तो पहला रूल ही यही है कि फिल्म बनाते वक्त बिल्कुल टेंशन मत लो. जितना आराम से काम करोगे और खुशी से काम करोगे उतना ही फिल्म के लिए अच्छा होगा. मेरे सेट पर बहुत अच्छा माहौल रहता है सब लोग पूरे इंजॉय के साथ काम करते हैं. इससे यह फायदा होता है कि जब आप कैमरे के सामने आते हैं तो आप अपना 100 परसेंट देते हैं. एक तो हैदराबादी भाषा इतनी अच्छी है कि काम करते हुए भी बहुत मजा आया.हां, जाह्नवी और और अंकित को हैदराबादी लैंग्वेज की सिखानी पड़ी क्योंकि वह दोनों ही हैदराबाद के नहीं है. मेरी बेटी जाह्नवी पैदा इंडिया में हुई लेकिन पढ़ाई के लिए वह बाहर विदेश में रही है. ज्यादातर समय जाह्नवी की जिंदगी बाहर ही गुजरी, तो इस रोल को करने से पहले वह बहुत टेंशन में थी कि इस भाषा से कैसे जुड़ पाएगी. क्योंकि भाषा ऐसी है कि हर कोई बोल नहीं सकता है, लेकिन बाद में सब चीजे सही हो गई. दोनों ने ही काफी मेहनत की और ये मेहनत रंग भी लाई 

सवाल- 70 के दशक से आपने शरुआत की थी. नसीर साहब के साथ स्टेज शेयर किया था. दूरदर्शन के क्लासिक शोज का आप हिस्सा रहे. कैसे याद करते हैं उस वक्त को ? कोई खास किस्सा बताएं ? 
जवाब-  वो जमाना तो अलग था ही पर उस जमाने की बात ही अलग थी. हम लोग जब उस टाइम प्राइड एंड प्रेजुडिस की भारतीय रीमेक तृष्णा की शूटिंग कर रहे थे, तो उस समय सीरियल बनाना नया नया था. टीवी ही उस समय नया था. वो इतना नया एक्सपीरियंस का टीवी शुरू हो रहा था और हम पूरे उत्साह के साथ सब प्लानिंग करते थे कि हम ऐसे करेंगे वैसे करेंगे. उस समय मुझे एक एपिसोड के 250 रुपए मिलते थे. लेकिन हां यह सब हम उस समय पैसों के लिए नहीं करते थे हम उस समय अपनी एक्टिंग को स्किल्स को बहुत इंजॉय करते थे. अब टाइम बदल चुका है अब सब कुछ कमर्शियल हो चुका है. और नसीर साहब के साथ स्टेज पर काम करने का एक्सपीरियंस तो अलग ही है. उनके साथ स्टेज शेयर करना मतलब बहुत कुछ सीखने जैसा था. मैं कहूं तो आप नसीर साहब को सिर्फ देख कर ही सीख सकते हैं कि एक्टिंग क्या है. उनके साथ परफॉर्मेंस की तैयारी करना और स्टेज पर आकर आपको अपने अंदर से कितना पोटेंशियल निकालना है इस सब बहुत अद्भुत अनुभव रहा. स्टेज और टीवी पर एक्टिंग करना दोनों अलग-अलग है. अब सब कुछ बदल चुका है, सब कुछ कमर्शियल ही हो गया है अब तो सीधा ये ही है कि हमें इतना चाहिए आप इतना दे सकते हैं तो ये रोल मैं कर सकता हूं. 

सवाल- आपको सबसे ज्यादा क्या पसंद है, स्टेज और प्ले या फिर टीवी एंड फिल्म्स ? 
जवाब: ये सब ही एक दूसरे से बिल्कुल अलग है. स्टेज पर सिर्फ और सिर्फ एक्टिंग मायने रखती है एक डायरेक्टर अपनी स्क्रिप्ट बता देता है फिर स्टेज पर जाकर सब कुछ एक्टर की एक्टिंग पर ही डिपेंड होता है. स्टेज पर एक एक्टर और ऑडियंस के बीच डायरेक्ट इंटरेक्शन होता है. स्टेज का थ्रिलर और मजा अलग ही होता है. और सिनेमा एक डायरेक्टर का मीडिया है. सिनेमा पर पूरा डायरेक्टर का कंट्रोल रहता है कि कितना करना है कैसे करना है किस हिसाब से करना है. क्योंकि हम कोई भी सीन ऐड कर सकते काट सकते हैं. एक्सप्रेस कहां तक रखने हैं. यह सब हम एडिटिंग टेबल पर डिसाइड कर सकते हैं. यहां पर क्या है एक्टर की एक्टिंग के बाद सब कुछ डायरेक्टर के हाथ में होता है. ऑफकोर्स एक्टर बहुत जरूरी है. दर्शक तो एक्टर्स की एक्टिंग ही देखते है. लेकिन यह सब कंट्रोल एक डायरेक्टर के हाथ में होता है. 

सवाल- क्या फिल्म के बाद आप वेब सीरीज में भी हाथ आजमाना चाहेंगे ? आजकल काफी डिमांड है.
जवाब- कभी बहुत अच्छा कोई सब्जेक्ट मिला तो मैं वेब सीरीज जरूर बनाना चाहूंगा. पर हां अभी मेरे पास 3 4 बहुत अच्छी स्क्रिप्ट्स है, तो इस साल तो मैं सिर्फ फिल्मों पर ही फोकस करूंगा. पर हां देखते हैं अगर कुछ एक्साइटिंग सब्जेक्ट मिला तो मैं जरूर वेब सीरीज बनाऊंगा., पर हां मैं जब भी सीरीज बनाउंगा एक 
लव स्टोरी ही बनाउंगा. जिसमें बहुत इमोशन्स होंगे. 

 

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