PeepingMoon Exclusive: ट्रोल नहीं बल्कि गुंजन सक्सेना की प्रेरणादायक कहानी दिखाने के लिए जान्हवी कपूर को बनाया जाना चाहिए IAF की पोस्टर गर्ल

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मुझे दूसरों के बारे में नहीं पता, लेकिन मैंने कभी गुंजन सक्सेना के बारे में नहीं सुना था, जब तक कि मैंने जान्हवी कपूर की कारगिल युद्ध मैं भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टर पायलट के कारनामों को धर्मा प्रोडक्शन के बैनर तले बनी बायोग्राफिकल में नहीं देखा था, जिसका नेटफ्लिक्स पर आज प्रीमियर हुआ है.

बात यह है कि, मैंने कारगिल वॉर को एक न्यूज़ एडिटर के रूप में रिपोर्ट किया था, जब देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जुलाई 1999 में भारत की जीत की घोषणा की थी. लेकिन, जब तक करण जौहर ने रिटायर्ड हो चुकी आईएएफ पायलट गुंजन सक्सेना की हिम्मत और प्रेरणादायक कहानी को फिल्म के जरिए सामने नहीं लाया, तब तक उसके बारे में भारत मे कोई नहीं जानता था.

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भले ही गुंजन सक्सैना शौर्य चक्र की पहली महिला प्राप्तकर्ता थी और उनके नाम से कारगिल बुक में एक चैप्टर भी है, जिसका नाम कारगिल: अनटोल्ड स्टोरी फ्रॉम द वॉर है, जो पूरी तरह से उनकी बहादुरी की कहानी पर समर्पित है. लेकिन अब उनके बहादुरी के किस्से फिल्म में हैं. और जान्हवी की शानदार परफॉर्मेंस के कारण आज भारत गुंजन सक्सैना को गर्व भरी निगाहों से देख रहा है.

मुझे IAF द्वारा सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC, the censors) को लिखित शिकायत करने की बात बचकानी लग रही है कि, फिल्‍म में उसे 'बेवजह निगेटिव' दिखाई गयी है. शिकायत में प्रोड्यूसर पर प्रामाणिकता के साथ बल का प्रतिनिधित्व करने में विफल रहने का आरोप लगाया गया है और साथ ही इसे अगली पीढ़ी के अधिकारियों को प्रेरित करने का प्रयास भी बताया गया है.

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इसमें यह भी बताया गया है कि भारतीय वायुसेना जेंडर न्यूट्रल है और उसने हमेशा पुरुष और महिला दोनों कर्मियों को समान अवसर प्रदान किया है. मुझे इसपर कोई शक नहीं है. लेकिन मुझे आश्चर्य है कि अगर 1994 में यह मामला था, जब गुंजन भारतीय वायुसेना में शामिल हुई थी,तो वह 24 साल की उम्र में कारगिल युद्ध का हिस्सा बनने वाली एकमात्र महिला कैसे बनीं. क्योंकि महिलाओं को फाॅर्स में स्वीकार किए जाने में लंबा समय लगा. जब तक मोदी सरकार ने 2015 में उन्हें लड़ाकू धारा में शामिल करने के लिए IAF योजना को मंजूरी नहीं दी, तब तक फ्रंट-लाइन कॉम्बैट रोल्स उनके लिए सीमित थीं.

मेरे दिमाग में अगर कुछ है, तो वो यह है की यह फिल्म आज भारतीय महिलाओं को रक्षा बलों में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रही है. ठीक उसी तरह, जब अमिताभ बच्चन को जंजीर में खाकी पहने देखकर पुलिस में शामिल होने की नौजवानों की ख्वाहिश होनी शुरू हो गयी थी. और इसलिए करते हैं कि फिल्में असल जीवन से जुड़ी हुई होती हैं. लोगों को प्रेरित होने के लिए नायकों की जरुरत होती है. और यह फिल्म वैसी ही भावना पैदा करती है.

आज की तारीख में हमारे पास सशस्त्र बलों में 9,449 महिलाएं हैं. रक्षा राज्य मंत्री श्रीपद नाइक ने मार्च में संसद को बताया कि 2020 में, भारतीय सेना ने 102 महिलाओं, भारतीय नौसेना 18 महिलाओं और भारतीय वायु सेना में एक भी महिला को शामिल नहीं किया गया था. ऐसे में शायद गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल के साथ यह ट्रेंड बदल जाएगा. इस वजह से भी, इस फिल्म को प्रोत्साहित करने की जरुरत है. बॉलीवुड फिल्मों में मनोरंजन के रूप में जो दिखाया जा रहा है, उसे देख हम संवेदनशील और आलोचनात्मक हो गए हैं. लेकिन समीक्षकों ने इस नई रिलीज की प्रशंसा एकमत होकर की है. जिसकी कहानी गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल की रेटिंग खुद बयां कर रही है.

मुझे लगता है कि जान्हवी ने गुंजन के रूप में विश्वसनीय काम किया है. भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर पायलट बनने के लिए शारीरिक, चिकित्सा और खुफिया परीक्षणों को पूरा करने के बाद वह नरम और सख्त, अपमान, अन्याय और चोट का सामना करती हैं, लेकिन युद्ध पर जाने के लिए कहे जाने पर उसकी आंखों में देशभक्ति की चमक देखने मिलती है. वह चीता हेलिकॉप्टर में बैठ कारगिल के लिए तैयार हो जाती है. उसमे कोई खोए हुए अवसर के लिए कोई दुर्भावना, कोई कड़वाहट नहीं है, बल्कि वह युद्ध में एक सैनिक है जो अपने राष्ट्र को गर्व महसूस कराने को उत्सुक होती है.

इस तरह से मुझे फिल्म में भारतीय वायुसेना का कोई नकारात्मक चित्रण दिखाई नहीं दे रहा है. बल्कि फिल्म उन चुनौतियों और संघर्ष के बारे में है, जिनका भारतीय वायुसेना में अपने करियर की शुरुआत में असली गुंजन सक्सेना ने सामना किया था. और इसे उसी तरह से देखा जाना चाहिए. कारगिल में अपना साहस दिखाने वाली दिग्गज, जिन्होंने खुले तौर पर अपनी बॉलीवुड की जीवनी की सराहना की है, ने कहा है, "अगर आपके पास इच्छाशक्ति और कौशल है, तो दोनों जेंडर्स को IAF में समान अवसर मिलते हैं." 

गुंजन सक्सेना एक ऐसी फिल्म है, जो तारीफ के काबिल है क्योंकि डायरेक्टर शरण शर्मा अगर चाहते तो वह गुंजन द्वारा किए गए 40 मिशंस को दिखा सकते थे, जिसमे गुंजन ने घायल जवानों को बचाया था और कारगिल के पहाड़ो में कठिनाई का सामना किया था. लेकिन उन्होंने सिर्फ एक ही दिखाया.

बाकी 'गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल' बिना मेकअप और कॉस्ट्यूम्स के एक प्रेरणादायक कहानी है. जो बिना डांस और गाने भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर पायलट बनने के लिए एक युवा लड़की के सपने और मेहनत की कहानी को खूबसूरत ढंग से दिखाई है. इस तरह से यह कहना गलत नहीं होगा कि जान्हवी को IAF की पोस्टर गर्ल बनना चाहिए. और ना की इस लाइफ टाइम रोल के लिए उन्हें ट्रोल किया जाना चाहिए.

 

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