PeepingMoon 2020: इरफान, मनोज बाजपेयी से लेकर नवाजुद्दीन सिद्दीकी तक, इन एक्टर्स ने फिल्मों में दिया अपनी एक्टिंग का जबरदस्त 'पंच'

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साल 2020 के साथ ही एक नए दशक की शुरुआत हुई. भले ही कोरोनावायरस की वजह से थिएटर बंद रहे हो पर डिजिटल प्लेटफार्मेस में इसकी कमी पूरी कर दी. इस साल कई फिल्में भले ही OTT पर रिलीज हुई हो, पर दर्शकों ने दमदार कहानी और किरदारों को हाथों हाथ लिया. वहीं हम अपने इस स्पेशल सेगमेंट में हम आपको बताएंगा उन टॉप एक्टर्स के बारे में जिन्होने अपने दम पर पूरी फिल्म को सम्भाला साथ ही अपनी एक्टिंग से फिल्म को जबरदस्त पंच देते हुए अपने किरदार से दर्शकों की बीच अपनी अलग पहचान बनाई. आइये नजर डालते है साल 2020 के बेस्ट एक्टर्स की लिस्ट पर. 

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अजय देवगन और सैफ अली खान: तान्हाजी द अनसंग वॉरियर
यह फिल्म मराठा योद्धा तानाजी मालुसरे के यश और गौरव की कहानी थी. जिसमें मराठाओं की आन-बान-शान को दिखाया गया. इतिहास में यह लड़ाई सिंहगढ़ के युद्ध के नाम से दर्ज है. अजय देवगन ने फिल्म में जाबांज योद्धा सूबेदार तानाजी मालसुरे का किरदार निभाया था. अजय देवगन यौद्धा के रूप में एकदम फिट लगे थे. मराठाओं के लिए मर-मिटने का इमोशन से भरा जज्बा भी लोगों को खूब पसंद आया. अपने हाव भाव और अभिनय के अलावा बेहतरीन संवादशैली से वो ताली बटोरने में कामयाब हुए. 


वहीं दूसरी तरफ उदयभान राटौड़ में सैफ अली खान बेहतरीन लगे थे. जिस तरह से वो मुस्कुराते हैं और कुटिल हँसी हँसते हैं वो एक विलेन को परदे में उतारने में सफल रहे थे. अपने हर सीन को उन्होंने बखूबी से निभाया. 

आयुष्मान खुराना, जितेंद्र कुमार: शुभ मंगल ज्यादा सावधान
आनंद एल राय निर्मित और हितेश केवल्या निर्देशित 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान' समलैंगिक रिश्तो पर बनी फिल्म थी. फिल्म का मैसेज बहुत क्लियर था कि होमोसेक्शुऐलिटी कोई बीमारी नहीं बल्कि कुदरत है, प्रकृति है और उससे आप नफरत नहीं कर सक सकते. फिल्म की कहानी कार्तिक और अमन यानी आयुष्मान खुराना, जितेन्द्र कुमार के प्यार में पड़ने की कहानी थी. वहीं फिल्म में जब अमन (जितेंद्र कुमार) के पिता (गजराज राव) को ये पता चलता हो तो उनकी जिंदगी में मानों तूफान सा मच जाता है. 

 

हर फ्रेम में आयुष्मान परफेक्ट लगे है. हमेशा की तरह अपने किरदार में जान डालते हुए वो बेस्ट की लिस्ट में शामिल हो गए. कार्तिक के रूप में आयुष्मान का फ्लैमबॉयंट और 'भाड़ में जाओ वाला' ऐटिट्यूड कहानी के लिए सोने पर सुहागा था. इसमें कोई शक नहीं की आयुष्मान ने गे चरित्र को न केवल करने का रिस्क उठाया बल्कि उसे बेहद मजबूती से अंजाम दिया. उनके अभिनय की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उनका समलैंगिक चरित्र दर्शक को कहीं भी विरक्त नहीं करता.


वहीं जितेंद्र कुमार की तारीफ करनी होगी कि अमन के रूप में वे कहीं भी उन्नीस साबित नहीं हुए. उन्होंने अपनी भूमिका को बेहद सटल अंदाज में निभाया है.हमेशा की तरह अपने किरदार में जान डाल दी. 

इरफान: अंग्रेजी मीडियम
साल 2017 में फिल्म आई थी हिंदी मीडियम. फिल्म ने दिखाया था कि एक अच्छे स्कूल में एडमिशन के लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं. अब तीन साल बाद फिर पापड़ तो बेलने हैं लेकिन स्कूल नहीं यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए. वो भी विदेशी यूनिवर्सिटी के लिए. इसी के इर्द-गिर्द घूमती थी होमी अदजानिया निर्देशित अंग्रेजी मीडियम की कहानी. इरफान खान की इस फिल्म को लोगों ने बहुत प्यार दिया. अपनी लास्ट फिल्म में इरफान ने कई यादों, कहानियों और अभिनय को हमेशा के लिए संजोने का पाठ छोड़ दिया. चंपक बंसल की भूमिका निभाते हुए,  इरफान बहुत इमानदार और प्यारे लगे थे. उनकी एक्टिंग वाक्य में लाजवाब थी. चाहे कोई इमोशनल सीन हो या हो कोई हंसी-मजाक, इरफान ने हर रूप में लोगों का दिल जीता था. 

संजय मिश्रा: कामयाब
निर्देशक हार्दिक मेहता की ये फिल्म इंडस्ट्री में साइडकिक्स कहलाने वाले उन कलाकारों के अस्तित्व के दर्द को बयान करती थी, जिन्हें हम उनके नाम से नहीं बल्कि साइड ऐक्टर्स के रूप में जानते हैं. इस दर्द को बयान करते हुए उन्होंने मेलोड्रामा का सहारा लिए बगैर फिल्म को जज्बाती, रियलिस्टिक और फनी तरीके से ट्रीट किया.  सुधीर (संजय मिश्रा) उन सह-चरित्र अदाकारों में से है, जिसका अपना एक दौर था, उस दौर में सुधीर तकरीबन हर दूसरी फिल्म में होता था, मगर आज वह फिल्मों की चमक-दमक, अपनी बेटी, दामाद और नाती से दूर अपने दोस्त और दो पेग के साथ अकेला रहता है. अपने जमाने में सुधीर की एक फिल्म का डायलॉग 'बस इंजॉइंग लाइफ, और कोई ऑप्शन थोड़ी है?' इतना फेमस हुआ था कि अब उस पर सोशल मीडिया पर मेसेजेस और फॉरवर्ड बन गए. एक अरसे बाद एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट उसका टीवी इंटरव्यू करने आती है और तब सुधीर को पता चलता है कि वह अब तक 499 फिल्में कर चुका है. उसके बाद सुधीर को धुन चढ़ जाती है कि अगर एक फिल्म में और काम कर कर ले तो 500 का आंकड़ा पार कर रेकॉर्ड बना सकता है. इसके बाद सुधीर को एक कास्टिंग डायरेक्टर एक रोल में कास्ट भी करता है, मगर उसके बाद सुधीर को रुपहले परदे की उन कड़वी सचाइयों से भी वाकिफ होना पड़ता है, जिसकी गहराई में वह कभी उतरा ही नहीं था. 
अभिनय के मामले में संजय मिश्रा लाजवाब रहे थे. उन्होंने न केवल विभिन्न किरदारों के गेटअप को न्याय दिया है मगर उन चरित्रों के बॉडी लेंग्वेज पर भी कड़ी मेहनत की थी. 

विनय पाठक: चिंटू का बर्थडे
इरान युद्ध के दौरान लगे लॉकडाउन में एक मिडिल क्लास परिवार अपने 6 साल के बेटे चिंटू का बर्थडे मनाने की तैयारी करता है. बाहर संकट है लेकिन परिवार पूरी तरह से साथ है. फिल्म 1 घंटे 23 मिनट की है. ऐसे में निर्माता ने फिल्म की कहानी कहने में बिल्कुल भी समय बर्बाद नहीं किया. फिल्म में बेहद प्यार करने वाले अभिभावक विनय पाठक का अभिनय शानदार था. 
चिंटू फिल्म में बुश पर आरोप लगाते हुए कहता है कि उनकी वजह से वो अपना बर्थडे नहीं मना पा रहा है. चिंटू के माता - पिता मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ चिंटू को आश्वस्त करते हैं कि वो उसकी इच्छाओं को इस संकट घड़ी में भी पूरा करने की कोशिश करेंगे. संकट घड़ी में कैसे पूरा परिवार साथ है बच्चे का छोटा सा सपना पूरा करने के पूरा परिवार लगा है. पूरे परिवार की आपसी समझ और प्यार इस फिल्म की नर्म सी मुस्कुराहट का कारण बनती है. फिल्म में विनय पाठक मदन के किरदार में बेहतरीन लगे हैं. इतने मुश्किल हालातों में भी चेहरे पर मुस्कान रखना और हर चीज़ में कुछ पॉज़िटिव ढूंढना, उन्हें एक बेहद प्यारा किरदार बनाता है. मदन पूरी फिल्म में चमकते हैं.

मनोज बाजपेयी: भोंसले
ये कहानीमुंबई की एक चॉल से शुरू होती है. इसमें रहते हैं गणपतराव भोंसले. एक बुजुर्ग पुलिस कॉन्सटेबल जो अब रिटायर हो चुके हैं. पूरी जिंदगी ड्यूटी की. इस शहर का शोर, शून्य, इसकी निरर्थकता को देखते हुए. इसलिए हमेशा चुप रहते हैं. अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं. गणपत भोंसले के किरदार में मनोज बाजपेयी का खामोश प्रदर्शन अचूक है. पात्र अंदर से कैसे घुट रहा है, उसका दिमाग तनाव से फट रहा है, ये सिर्फ चेहरा देखकर पता चलता है.

कुणाल खेमू: लूटकेस
कुणाल केमू ने बेहद सहजता के साथ कॉमिक फिल्म लुटकेस को आम से खास बना दिया. फिल्म में उन्होंने एक मध्यम वर्ग के व्यक्ति नंदन कुमार की भूमिका निभाई, जो अपनी नौकरी से तंग आ जात है. एक दिन, उन्हें नकदी से भरा एक लाल चमकता हुआ बैग मिलता और फिर आगे क्या होता है और नंदन की जिंदगी कैसे बदलती है, यह एक दिलचस्प कहानी है. चॉल में रहने वाले के किरदार में बिल्कुल रंग जाने वाले कुणाल ने नंद कुमार का किरदार बेहतरीन तरीके से निभाया है.

 

नवाजुद्दीन सिद्दीकी: रात अकेली है और सीरियस मैन
नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने इस साल 'सीरियस मैन' और 'रात अकेली है', जैसी बड़ी रिलीज दी. नवाजुद्दीन 'रात अकेली है' में जतिल यादव तो 'सीरियस मैन' में अयान मणि बनकर लोगों कै दिल जीता. 
'रात अकेली है' की कहानी एक रसूखदार परिवार की थी. जिसके मुखिया का कत्ल उसकी शादी की रात ही हो जाता है. इसके बाद पहुंचता है पुलिस इंस्पेक्टर जटिल यादल (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) और शुरू करता है जांच. इस शख्स की दुल्हन है राधिका आप्टे और कत्ल का शक उसी पर जाता है. लेकिन फिर एक के बाद एक कड़िया खुलती जाती हैं और मर्डर मिस्ट्री का सच सामने आता है. 'रात अकेली है' में नवाजद्दीन सिद्दीकी ने शानदार अंदाज में एक्टिंग की थी. 


'सीरियस मैन' की कहानी नवाजुद्दीन सिद्दीकी की थी. जिसकी पूरी जिंदगी संघर्ष करते हुए गुजर रही थी. वह एक रिसर्च इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट के तौर पर काम करता है और तंग हालात में रहता है. लेकिन वह चाहता है कि जिस तरह का जीवन उसने जिया है, वैसा जीवन उसके बेटे को नहीं जीना पड़े. फिर एक दिन पता चलता है कि उसका दस साल का बेटा मैथ का जीनियस है. इस तरह नवाजुद्दीन सिद्दीकी को अपनी जिंदगी बदलती हुई लगती है. लेकिन इस बात के पीछे भी एक सच है और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के कैरेक्टर की भी एक कहानी है. इस तरह सुधीर मिश्रा का डायरेक्शन और कहानी कहने का अंदाज दोनों बढ़िया था. एक्टिंग की बात करें तो नवाजुद्दीन एक बार फिर पूरी तरह से कामयाब रहे. उन्होंने मणि के किरदार को पूरी शिद्दत के साथ निभाया था. नवाजुद्दीन का यह कैरेक्टर भी बहुत ही सशक्त तरीके से सामने आता है. 


कुमुद मिश्रा: राम सिंह चार्ली
फिल्म रामसिंह चार्ली की कहानी का किरदार राम सिंह (कुमुद मिश्रा) ही था. पौने दो घंटे की ये फिल्म पूरी तरह से कुमुद मिश्रा पर टिकी रही थी. उनका मुस्कुराना, रोना, अदाकारी, हल्केपन में बात कहना. सबकुछ आपको देखने पर मजबूर कर देता है. राम सिंह का किरदार फिर चाहे वो कुछ देर के लिए चार्ली चैपलिन वाला हो या फिर सड़क पर रिक्शा दौड़ाते हुए कुमुद मिश्रा ने अपने दम पर पूरी फिल्म को बांधे रखा था. 
 

अक्षय कुमार: लक्ष्मी
फिल्म में अक्षय कुमार आसिफ का किरदार निभाते है.  आसिफ एक ऐसा व्यक्ति हैं जो तर्क और विज्ञान में विश्वास रखता है. इसी बीच वो एक किन्नर भूत के बस में आ जाता है. शरद केलकर ने किन्नर भूत की भूमिका निभाई है. फिल्म की शुरुआत हंसी-मजाक से होती हैं. आगे चलकर एक अंधेरे रहस्य का पता चलता है. अक्षय कुमार को लक्ष्मी के रूप में देखना रोंगटे खड़े कर देता है. अक्षय की चाल, उनके डायलॉग, उनके एक्सप्रेशन सभी को रोक के रखने वाले थे. फिल्म में अक्षय के रोल को देखना ही सबसे मजेदार है.

राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी 
अनुराग बासु की मल्टी एक्टर्स फिल्म लूडो में राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी ने लाइमलाइट चुरा ली. फिल्म में पंकज त्रिपाठी ने सत्तू भैया नाम के एक अंडरवर्ल्ड डॉन का किरदार निभाया था. उसका अड्डा शहर के बाहर स्थित है ताकि पुलिस उसे कानूनी रूप से नुकसान ना पहुंचा सके. उसने एक बिजनेस मैन का मर्डर किया था.  पंकज त्रिपाठी का सत्तू भैया वाला रोल फिल्म की जान है. पंकज त्रिपाठी, जिन्होंने प्रभावी रूप से गैंगस्टर भूमिकाओं के लिए बेंचमार्क सेट किया है, अभी भी अपने कावीन भैया (मिर्जापुर) अवतार में हैं. कम शब्दों के साथ, वह अपने चेहरे और आंखों के साथ बोलते हैं. 


वहीं राजकुमार राव ने आलोक कुमार उर्फ 'आलू’ का किरदार निभाया था. राजकुमार राव ने एक बार फिर सबको इम्प्रेस किया था. मिथुन चक्रवर्ती के फैन बने राजकुमार ने अपनी मासूम मुस्कान और बच्चे जैसी उत्साही अभिव्यक्तियों के साथ,एक्टर को सीधे सभी के दिलों में पहुंचा दिया. 

सुशांत सिंह राजपूत: दिल बेचारा 
'जन्म कब लेना और मरना कब है ये हम डिसाइड नहीं कर सकते, लेकिन कैसे जीना है वो हम कर सकते हैं.' सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फ़िल्म 'दिल बेचारा', मूवी के इस डायलॉग के इर्द-गिर्द रची-बुनी गई थी. 'दिल बेचरा' एक अच्छी और संजीदा फ़िल्म थी. फिल्म में सुशांत ने इमैन्युल राजकुमार जूनियर उर्फ मैनी का किरदार निभाया था. मैनी एक दिल फेंक लड़का था. उसे लाइफ़ में सिर्फ खुश रहना आता था. सुशांत सिंह राजपूत ने जाते-जाते अपनी अदाकारी से दिल जीतने वाला काम किया था. मस्तमौला और जिंदादिल मैनी के किरदार में सुशांत सिंह राजपूत खूब जंचे थे. 
 

अमिताभ बच्चन: गुलाबो सिताबो
शूजित सरकार निर्देशित फ़िल्म में अमिताभ बच्चन एक बूढ़े मकान मालिक तो आयुष्मान उनके किराएदार के किरदार में दिखाई दिए थे. फिल्म की कहानी 78 साल के लालची, झगड़ालू, कंजूस और चिड़चिड़े स्वभाव के मिर्जा (अमिताभ बच्चन) के आस-पास घूमती है, जो अपनी हवेली को जान से भी ज्यादा प्यार करता है. यह पुरानी और जर्जर हो चुकी हवेली मिर्जा की बीवी फातिमा की पुश्तैनी जायदाद है. इसका नाम फातिमा महल है. मिर्जा इतना लालची है कि वह पैसों के लिए हवेली की पुरानी चीजों की चोरी करने और उन्हें बेचने से भी गुरेज नहीं करता. हवेली का मालिक बनने की आस रखने वाले मिर्जा को खुद से 17 साल बड़ी बीबी फातिमा के मरने का इंतजार रहता है. एक मोटी दाढ़ी, मोटा चश्मा, घिसा हुआ कंधा और एक अप्रिय प्रोस्थेटिक नाक को स्पोर्ट करना, किसी को विश्वास नहीं हो सकता है कि वह व्यक्ति अमिताभ बच्चन थे. वह आसानी से अपनी असली पहचान के बारे में बताए बिना लखनऊ की गलियों में धूमे थे. मिर्जा के रूप में काफी इम्प्रेशिव लगे थे. 


 

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