Kaagaz Review: पंकज त्रिपाठी की शानदार एक्टिंग से भरपूर है सतीश कौशिक के निर्देशन में बनी यह फिल्म

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फिल्म: कागज 
कास्ट: पंकज त्रिपाठी, मोनाल गज्जर, सतीश कौशिक, मीता वशिष्ठ, बृजेन्द्र काला, अमर उधय, नेहा चौहान
निर्देशक: सतीश कौशिक
OTT: Zee5 और कुछ सिनेमाघरों में 
रेटिंग: 3 मून्स

हमारे देश में किसी काम को कोई इतना मुश्किल नहीं समझता, जितना सरकारी काम को समझते हैं. हम बात कर रहे हैं, भारत में नौकरशाही और उसके बाद के अधिकारी नगर निगमों, जिला परिषद, अदालत, पुलिस अन्य की. आम आदमी को अक्सर खंड विकास अधिकारी के पास जाना या किसी पुलिस स्टेशन में अपना कदम रखना किसी तलवार के नीचे सर रखने जैसा लगता है. ऐसे में सतीश कौशिक द्वारा निर्देशित फिल्म 'कागज' की कहानी 70 के दशक में एक आदमी को कागज पर मृत घोषित किये जाने के बाद की लड़ाई पर आधारित है. कहानी में आप लचीलापन, दृढ़ संकल्प और हिम्मत की झलक देख सकते हैं. और ऐसा ही करते हुए आप पंकज त्रिपाठी को फिल्म में देख सकते हैं.

लाल बिहारी 'मृतक' की सच्ची और प्रेरणादायक कहानी पर आधारित, इस किरदार के चाची और चाचा मिलकर उसे कागज पर मृत घोषित कर देते हैं, ताकि लाल बिहारी 'मृतक' अपने हिस्से की जमीन न ले सके. फिल्म में पंकज त्रिपाठी असहाय व्यक्ति लाल बिहारी 'मृतक' की भूमिका में हैं, जो खुद को जिन्दा साबित करने के लिए एक से दूसरी जगह भागता रहता है. बोल्ड और अनबॉस्ड कागज़ उन लोगों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की भावना को जगाने की कोशिश करता है, जिन्हें इसकी ज़रूरत है.

हालांकि, फिल्म की गति और इसकी एक-आयामी कहानी कहने की तकनीक इसे थोड़ा थकाऊ और नीरस बनाती है. इस फिल्म की कहानी को शानदार तरीके से पेश किया जा सकता था, लेकिन इस बायोग्राफी में कॉमेडी का तड़का इसकी गंभीरता को छीन लेती है. असल में देखा जाये तो, यह कहानी हंसी का विषय नहीं है. फिल्म शायद ज्यादा प्रभाव पैदा करती अगर उसे ड्रामा जॉनर के तहत बनाया गया होता और सलमान खान और सतीश कौशिक के रूप में दो नारटर्स का जिक्र नहीं किया जाता.

हालांकि, कागज की सबसे मजबूत कड़ी और कोई नहीं बल्कि खुद पंकज त्रिपाठी हैं. साधारण परिवार के व्यक्ति जो कि बैंडमास्टर है के रूप से लेकर न्याय पाने की लड़ाई लड़ रहे विद्रोही तक पंकज ने अपनी एक्टिंग का कमाल दिखाया है. वहीं, फिल्म में सतीश कौशिक ने एक्टर के साथ निर्देशक की भी कमान संभाली है. हालांकि, वह नैतिक रूप से एक हारे हुए वकील के किरदार में बेहद अच्छी तरह से नजर आ रहे हैं. जबकि, निर्देशक के रूप में वह अभावग्रस्त हैं. जी हां, डायरेक्शन के मामले में वह विफल रहे हैं, क्योंकि कहानी में उत्साह ही कमी है, साथ ही साथ कल्पना की भी. फिल्म में सपोर्टिंग किरदार त्रिपाठी की तुलना में फीके हैं और यह फिल्म में एक बड़ी कमी है. 

70 के दशक और उस युग के सार को कॉस्ट्यूम डिजाइनर सुजाता राजन द्वारा प्रभावी रूप से कैप्चर किया गया है, और अकोडेब मुखर्जी की सिनेमैटोग्राफी बेहद अच्छी है. कुल मिलाकर, कागज़ एक प्रेरणादायक कहानी हो सकती थी, जिस पर यह आधारित है, लेकिन यह कल्पना को प्रज्वलित करने में विफल है; इसके बजाय यह सिर्फ त्रिपाठी की शानदार स्क्रीन प्रजेंस और एक्टिंग टैलेंट के लिए खड़ी है. एक्टिंग के मामले में यह फिल्म त्रिपाठी के तरफ से एक मास्टरक्लास है.

PeepingMoon कागज को 3 मून्स देता है.

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