शोहरत एक नशा होता है जो चढ़ता है, तो एक दिन उतर भी जाता है: धर्मेंद्र

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धर्मेंद्र, सनी और बॉबी देओल की फेमस फिल्म सीरीज 'यमला पगला दीवाना' की अगली फिल्म 'यमला पगला दीवाना फिर से' 31 अगस्‍त को रिलीज होगी. फ‍िल्‍म से जुड़े सवाल, अपना फ‍िल्‍मी सफर और पोते करण देओल के बारे में धर्मेंद्र ने की खास बातचीत...

सवाल: आपका अंदाज हमेशा सबसे जुदा रहा है. उम्र के इस पड़ाव पर भी आप ऑडियंस के दिलों पर राज करते हैं. कैसा लगता है?
जवाब: मेरे लिए यही सबकुछ है. मैं इसीलिए जीता हूं कि कुछ न कुछ ऐसा करता रहूं जिससे लोगों को खुशी मिले और जब वो बदले में इतना प्यार देते हैं, तो बहुत अच्छा लगता है. यही प्यार और खुशी पाने के लिए ही आदमी एक्टर बनता है. हर एक्टर चाहता है कि मुझे लोग प्यार करें, मेरे काम को सराहें और कोई वजह नहीं होती है. शोहरत का तो एक नशा होता है-जो चढ़ता है, तो एक दिन उतर भी जाता है. पर मैं यहां लोगों का प्यार हासिल करने के लिए ही हूं. प्यार मोहब्बत एक ऐसा जज्‍बा है जो लोगों के दिलों में घर कर जाता है.

सवाल: हमने आपको ज्‍यादातर पंजाबी अंदाज में देखा है. लेकिन फिल्म के ट्रेलर में आप गुजराती बोलते भी नजर आ रहे हैं. यह अनुभव कैसा रहा?
जवाब: यह बहुत अलग और अच्छा अनुभव था. हमें काफी कुछ सीखना भी पड़ा. फिल्म में हम तीनों बाप-बेटे के किरदार में नहीं हैं. मैं इनका एक चालूकिस्म का किरायेदार बना हूं. तो यह किरदार बहुत दिलचस्प रहा.सवाल: 'यमला-पगला-दीवाना' के मायने आपके लिए क्या हैं? 70 के दशक में आपका एक गाना था इसी नाम से और अब इसी नाम से आपकी यह तीसरी फिल्म है?
जवाब: मेरे लिए 'यमला-पगला-दीवाना' एक ऐसा कॉम्बिनेशन है जहां एक गांव का भोला-भाला सीधा-साधा बंदा है, एक सनकी पागल इंसान है, और एक दीवाना आशिक है. हमारी फिल्म के लिए स्टोरी इस हिसाब से तैयार होती है कि ऑडियंस को ये तीनों किरदार नजर आएं. 70 के दशक में आई फिल्म 'प्रतिज्ञा' में भी किरदार इससे मिलता जुलता था. हालांकि वो एक रिवेंज फिल्म थी, लेकिन ऑडियंस पूरी फिल्म में हंस रही थी. कैसे एक ट्रक चलाने वाला बंदा पुलिस वाले का रूप धर लेता है. उसे कुछ नहीं पता पुलिस के बारे में, लेकिन इतने कॉन्फिडेंक्स के साथ वो उस किरदार में घुस जाता है, यह सब किसी यमले-पगले-दीवाने के ही बस का है. उसमें कोई मेथड एक्टिंग नहीं होती. मैंने जब 'अपने' फिल्म बनाई, तो उसमें ऑडियंस को बहुत रुलाया. फिल्म सबको बेहद पसंद आई, लेकिन वो बोले कि 'धरम जी, आपने बहुत रुलाया हमें'. तो मैंने ऐसे ही उनको बोल दिए कि अगली बार जमकर हंसाऊंगा और बस, उसके बाद कॉमेडी कि दिशा में सोचा तो 'यमला-पगला-दीवाना' निकलकर आई.

सवाल: पहले हमनें कभी आपको अपनी फिल्मों का प्रमोशन करते हुए नहीं देखा. तो अब आप क्यों प्रमोशन्स कर रहे हैं? किसी कैम्प से भी जुड़े हैं आप?
जवाब: नहीं, मैं किसी कैम्प से नहीं जुड़ा हूं. रही बात प्रमोशन की, तो यह सब आजकल के जमाने में एक चलन आ गया है. खाने से पहले जैसे स्टार्टर्स परोसते हैं न, ठीक वैसा ही. ताकि ऑडियंस के मन में जिज्ञासा जागे की मेन-कोर्स कितना लज़ीज़ होगा. मैं तो ये भी नहीं जानता था कि ये ट्वीट वगहरह क्या होते हैं. लेकिन हां, आवाम के साथ एक कनेक्टिविटी बनाने के लिए मैं मानता हूं कि यह सब ज़रूरी भी है. और मैं मानता हूं कि ऑडियंस आपको अगर इतना प्यार देती है, तो उसे पे-बैक करने के भी यह अच्छा तरीका है कि आप आवाम के बीच जाइये, उनसे मिलिए और उन्हें खुश रखिये. मैं हमेशा कहता हूं 'चल रहे हो, तो बताने की जरुरत नहीं. रुक गए जिस दिन, तो पूछेगा कोई नहीं. जानते हैं जो, ढोल वो पीटते नहीं. चलते रहते हैं बस मुड़कर देखते हैं.'

सवाल: आप सोशल मीडिया को कैसे देखते हैं?
जवाब: सोशल मीडिया के जरिये आपके हाथ में एक पॉवर है कि आप मानवता को समेट सकते हैं, लोगों को एक दूसरे के करीब ला सकते हैं. लेकिन जब इसका दुरुपयोग होता है, तो वो देखकर बुरा लगता है. मेरे लिए ह्यूमैनिटी सबसे बड़ी चीज़ है. तो हमें सोशल मीडिया के ज़रिये सबके भले का सोचना चाहिए.

सवाल: फिल्म में स्पेशल अपीयरेंस में शत्रु जी, रेखा जी भी हैं. यह गेस्ट अपीयरेंस का ख्याल कैसे सूझा?
जवाब: यह तो मेरा परिवार है. ये सब मुझे बहुत प्यार करते हैं और बहुत अच्छे से मेरे साथ कनेक्ट करते हैं. ऐसे ही सलमान है, बहुत मानता है मुझे और मुझे बहुत प्यारा है वो. मुझे लगता है कि हम दोनों में कई क्वालिटीज एक जैसी हैं. बॉबी का भी अच्छा दोस्त है वो. उधर शत्रु और मैं काफी अरसे से अच्छे दोस्त हैं. एक साथ खा रहे हैं, पार्टी कर रहे हैं. तो सबने सोचा कि अगर इन सब कलाकारों की एक गेस्ट अपीयरेंस हो जाए, तो ऑडियंस को एक अच्छा गुलदस्ता मिलेगा.

सवाल: 'सत्यकाम' के बाद कौन सी ऐसी फिल्म है जो आप मानते हैं कि एक पवित्र फिल्म रही हो?
जवाब: 'सत्यकाम' 60 के दशक में आई थी. उसके बाद हमने 'दोस्त' फिल्म बनाई 74 में. फिर हमने 'नया जमाना' बनाई और ये फिल्में साथ-साथ चलीं. 'नया जमाना' एक बेहतरीन फिल्म थी, किसी ने उस पर कोई ऊंगली नहीं उठाई. उसके डायलॉग्स भी बहुत प्यारे थे. ऐसी फिल्में और भी बननी चाहिए. आप 'दोस्त' फि‍ल्म देखिए, पूरी तरह से मानवता के ऊपर है वो फिल्म. ऐसी फिल्में दिल छू जाती हैं. हालांकि मैंने यह भी देखा है कि अच्छा रोल अगर मिल जाए तो मुझे एक्टिंग करनी भी नहीं पड़ी. खुद-ब-खुद अंदर से वो जज़्बात बाहर आते हैं.

 

सवाल: इंडस्ट्री में 60 साल से भी ज़्यादा बिठाये हैं आपने. क्या अभी भी 'फ्राइडे' के दिन वो घबराहट होती है अजब आपकी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर रिलीज़ को तैयार हो?
जवाब: कहीं न कहीं तो घबराहट होती है. मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है. और इस इंडस्ट्री में सबसे बड़ा कोई कष्ट है अगर, तो यही है. रिलीज़ के समय हम सोच रहे होते हैं कि पता नहीं क्या होगा ! हम सोचते रहते हैं कि काश ये भी कर दिया होता, वो भी कर दिया होता. लेकिन रिलीज़ के बाद तो सब ऑडियंस के हाथ में होता है. जब तक ऑडियंस नहीं कहती कि "धर्मेंद्र, फिल्म अच्छी लगी !" - तब तक ऐसे ही धड़कन तेज़ रहती है. मैंने एक शेर खुद लिखा है इस पर: "लहर ख़ुशी की आते ही चली जाती है, घड़ी ग़म की जाते-जाते जाती है." अब जैसे पहली "यमला पगला दीवाना" हिट फिल्म थी. उसके बाद दूसरी फ्लॉप हो गयी. लेकिन फ्लॉप ने जो दिल तोडा, तो पहली की सक्सेस भूल गए हम भी. वो ग़म तो जाते जाते ही जाता है.

सवाल: आपके सामने इतनी पीढ़ियां निकली हैं इंडस्ट्री में. अब सनी सर का बेटा करण भी आ रहा है. तो उसके अंदर ऐसा क्या ख़ास आपको लगता है जो आपके मुताबिक उसे आगे लेकर जाएगा?
जवाब: वो बिल्कुल कच्ची मिट्टी जैसा है, वो खुद को एक अच्छी पर्सनालिटी में ढाल रहा है. हाँ, वो एक स्टार का बेटा है - लेकिन उसका बहुत बड़ा प्रेशर भी होता है. उसकी तुलना भी कि जायेगी हर जगह. लेकिन अच्छी बात यह है कि अभी वो बिल्कुल रॉ (कच्चा) है. और किस्मत लिखने वाले हम कौन होते हैं.

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