'A Suitable Boy' Review: मीरा नायर के एडेप्टेशन की जान है तब्बू और ईशान खट्टर की अनोखी केमिस्ट्री

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शो: 'अ सूटेबल बॉय'
कास्ट: तब्बू, ईशान खट्टर, तान्या मनिकतला, नमिता दास, रसिका दुग्गल, राम कपूर, मिकेल सेन, दानेस रजवी, शहाना गोस्वामी, रणदीप हुड्डा, कुलभूषण खरबंदा, विनय पाठक, मनोज पाश्वा, विवान शाह, माहिरा कक्कर 
डायरेक्टर:  मीरा नायर
ओटीटी: नेटफ्लिक्स 
रेटिंग: 3 मून्स  

'A Suitable Boy' शायद अंग्रेजी में लिखे गए सबसे बेहतरीन, सबसे लंबे और अच्छी तरह से लिखे गए उपन्यासों में से एक है. विक्रम सेठ की बेस्टसेलिंग बुक 'अ सूटेबल बॉय' पर आधारित इस सीरीज को मीरा नायर ने डायरेक्ट किया है. उपन्यास पर छह एपिसोड की वेब सीरीज लिखी है एंड्रयू डैविएस ने.एंड्रयू ने इससे पहले पहले चर्चित उपन्यासों ‘वार एंड पीस’ और ‘लेस मिसरेबल्स’ पर पटकथाएं लिख चुके हैं, यहां भी उनका लेखन वैसा ही है. वेब सीरीज ‘अ सूटेबल ब्वॉय’ इतिहास का दस्तावेज तो नहीं है लेकिन नया संविधान लागू होने के ठीक बाद के समय में एक मस्जिद के सामने किसी धन्नासेठ का सिर्फ इसलिए मंदिर बनवा देना कि नमाज के वक्त वो काबा की तरफ रुख करें तो उन्हें सामने शिवलिंग नजर आए, इस सीरीज की अंतर्धारा है.

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सीरीज की कहानी साल 1951 के उस दौर की है, जब भारत को आजाद हुए कुछ ही साल हुए थे. सीरीज कई हिस्सों में बंटी हुई है. इसकी कहानी एक साहित्य की स्टूडेंट लता (तान्या मनिकतला) और उसकी मां को लेकर है, जो उसकी शादी के लिए लड़का ढूंढ रही है. अपने परिवार के प्रति ज़िम्मेदारियों और रोमांस की उत्सुकता के बीच लता भावनाओं के ऐसे सफ़र पर निकलती है, जहां दिलों के जुड़ने के साथ टूटने की चुभन भी है. उसकी ज़िंदगी में तीन पुरुष आते हैं, जो उसका दिल जीतने की कोशिश करते हैं. इस देश में एक लड़की के जीवन की सारी सार्थकता शादी कर लेने में ही क्यों रही है, इस यक्ष प्रश्न का सवाल शायद ही किसी को अब भी मिल पाया हो. उसे एक ‘सूटेबल ब्वॉय’ तलाशना है। इस तलाश में उसे कबीर दुर्रानी मिलता है, लेकिन वह मुसलमान है तो घर वाले इसकी इजाजत नहीं देते. फिर हरेश खन्ना मिलता है जो फर्स्ट डेट पर उसे अपनी टैनरी में लेकर जाता है. और तीसरा है अमित चटर्जी. पुस्तक में जमीन की राजनीति और सामाजिक मानदंडों पर महत्वपूर्ण सामाजिक टिप्पणी है. हालाँकि, यह शो एक हाई स्कूल स्टेज शो जैसा है, जिसमें आधे बेक्ड कैरेक्टर और कोई गहराई नहीं है. वेब सीरीज ‘ए सूटेबल ब्वॉय’ के छह एपीसोड में कोई सौ से ऊपर किरदार आपको देखने को मिलेंगे. मेहरा, कपूर, चटर्जी और खान परिवारों के ये किरदार कभी भी कहीं से कहानी में आ जुड़ते हैं. 


यह शो प्रतिभाशाली भारतीय एक्टर्स से भरा हुआ है. एक अंग्रेज एक भारतीय को अंग्रेजी बोलने और कार्डबोर्ड उच्चारण करने के लिए अनुभव करता है. अंग्रेजी के डायलॉग्स को अजीब हिंदी में बनाए गए है. इससे यह पता लगाना मुश्किल होता है कि भाषा का विकल्प पुस्तक के करीब रहना था या भारत के पश्चिमी दर्शकों की धारणा के अनुरूप था. मेकर्स द्वारा यह तर्क दिया जा सकता है कि सेठ की बुक की वजह से माध्यम का चुनाव किया गया था. यह शुरू से ही स्पष्ट है कि सीरीज एक श्वेत दर्शकों को पूरा करती है और भारतीय लोगों को इसे पहचानने या इसे मनाने में परेशानी हो सकती है. ये वह भारत है जिसे विदेशी देखना चाहते हैं. पुरानी हवेलियां, डिजाइनर कपड़े, पर्दे के पीछे पनपते जिस्मानी रिश्ते, घर में चलने वाली कूटनीतियां वगैरह वगैरह.

लता के रूप में तान्या मानिकतला शानदार लगी है. उनकी मुस्कान से उनकी परेशानियों और इमोशन्स को समझना मुश्किल हो जाता है. उसकी मुस्कान उनके कैरेक्टर की गहराई को दूर ले जाती है. लता की माँ के रूप में माहिरा कक्कड़ शानदार हैं. वहीं साथ ही कहानी चलती है धर्म की राजनीति के तनाव से खिंचे इस कैनवास पर दो जवां दिल अपने होने का मकसद जिंदगी के रंगों संग चलती कूंची में तलाश रहे हैं. सुरमई आंखों वाले मान को सईदा से नाम मिलता है दाग साब का. और, दाग साब की ये सईदा इतने हिस्सों में बंटी है जितने में कि इस देश को बांटने की कोशिशें शुरू से चलती रही हैं. मान कपूर के रूप में ईशान खट्टर शानदार लगे है. तब्बू और ईशान के बीच की केमिस्ट्री देखने लायक है. एक सीन है, जहां एक हिंदू-मुस्लिम दंगे के दौरान मान अपने दोस्त फ़िरोज़ को खून से लथपथ भीड़ के हाथों से बचाता है, ये इसलिए बताया है क्योंकि उनकी दोस्ती में कुछ होमो-सेक्शुअल टेंशन है, मान की कहानी में नवाब के बेटे से उसकी दोस्ती को समलैंगिक इशारा देने की कोशिश भी पटकथा लेखक ने की है, लेकिन इसका विस्तार बाद में गायब मिला. मेकर्स उस पर ध्यान नहीं देते हैं.


ये नोवल अपने बोल्डनेस जिसमें  रोमांस, नेरेशन और कैरेक्टराइजेशन को अच्छे से बुना है, लेकिन सीरीज केवल बोल्डनेस पर बेस्ड है, अभिनय के लिहाज से ‘अ सूटेबल ब्वॉय’ तीन कलाकारों के करियरनामे का हीरा है. पहली तब्बू, जिन्हें सईदा के किरदार में देखने के बाद किसी दूसरे कलाकार का नाम यहां सोच पाना मुश्किल है. एक उम्रदराज तवायफ के किरदार में तब्बू ने अपने से आधी उम्र के लड़के संग रूहानी और जिस्मानी रिश्ते बनाए हैं. उनका अभिनय उनकी आंखों से बोलता है और आंखों से ही सब कुछ कह जाने के मामले में दाद के लायक काम किया है ईशान खट्टर ने. तान्या मानिकताला ने लता के रूप में सीरीज को एक अलग तेवर और साथ ही साथ एक जरूरी सौम्यता भी प्रदान की है. जटिल चरित्र को तान्या ने बेहद सहजता से पर्दे पर जीया हैं. 

‘अ सूटेबल ब्वॉय’ को तकनीकी रिव्यू में उतने नंबर नहीं मिलते. हां लेकिन सीरीज में शानदार ढंग से बनाए गए सेट, कॉस्ट्यूम और स्थानों की भव्यता और स्वतंत्रता के बाद के शहरों, हवेलियों और ऑफिशियल बिल्डिंग्स काबिले तारिफ है. सीरीज वाइब्रेंट, कलरफुल और एंगेजिंग है, लेकिन एक वाइट ऑडियंस के लिए. एक भारतीय दर्शकों को सामाजिक वास्तविकताओं, रीति-रिवाजों की कुछ गलत व्याख्याएँ मिल सकती हैं, क्योकिं जो वास्तव में देश में प्रचलित नहीं है. इस सीरीज से भारतीय दर्शकों को कनेक्ट होने में मुश्किल हो सकती है. हालाँकि, इस तरह की बुक को स्क्रीन पर लाना एक बहुत बड़ा काम है और इसके लिए मीरा नायर निश्चित रूप से श्रेय की हकदार हैं.

           पीपिंगमून 'A Suitable Boy' को देता है 3 मून्स 

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