Pagglait Review: सामाजिक हथकड़ियों को तोड़ 'विडो' सान्या मल्होत्रा अपने विश्वास के दम पर लगाती है 'ऊंची उड़ान'

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फिल्म: पगलैट 
कास्ट: सान्‍या मल्‍होत्रा, सान्या मल्होत्रा, आशुतोष राणा, शीबा चड्ढा, रघुबीर यादव, श्रुती शर्मा, राजेश तैलंग, नाताशा रस्तोगी, मेघना मलिक, शरीब हाशमी, आसिफ खान, जामील खान, सचिन चौधरी और नकुल सहदेव
डायरेक्टर: उमेश बिष्ट
अवधि: 1 घंटा 54 मिनट्स 
ओटीटी: नेटफ्लिक्स 
रेटिंग: 3 मून्स 

हिंदू धर्म में जीवन और मृत्यु का गहरा अर्थ होता है. हमारी संस्कृति के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी आत्मा लगभग 13 दिनों तक हमारे आस पास रहती है क्योंकि कहा जाता है कि यह कई सालों से जिस शरीर से जुड़ा था, उसे छोड़ के जाने में थोड़ा टाइम लगता है. और फिर आत्मा एक अलग रूप लेती है और शांति प्राप्त करती है. उमेश बिष्ट की यह फिल्म इन्हीं 13 दिनों के शोक के महत्व के बारे में घूमती है, इस दौरान  कैसे इंसान, मृत या जीवित, इमोशन्स से घिरा रहता है इसी को समझाती है. ये फिल्‍म भावनाओं के इर्द-गिर्द घूमती एक कहानी है जो एक मिडिल क्‍लास परिवार को एड्रेस करती है. नेटफ्लिक्स पर आज रिलीज हुई इस फिल्म में सान्या मल्होत्रा, आशुतोष राणा, शीबा चड्ढा, रघुबीर यादव जैसे कलाकार है. 

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पगलैट में लखनऊ स्थित एक गिरि फैमिली की कहानी को दिखाया गया है. शिवेंद्र गिरि (आशुतोष राणा) और उनकी पत्नी उषा गिरि (शीबा) अपने बेटे आस्तिक के असामयिक निधन पर शोक्ड है. बूढ़े माता-पिता बिखर गए है क्योंकि उनकी फैमिली का एक कमाने वाला मजबूत शख्स, उनके बुढ़ापे का सहारा और उनके जीने का जरिया अब नहीं रहा. परिवार शोक मना रहा है, लेकिन आस्तिक की विधवा पत्नी संध्या (सान्या) को रोना और अपना दुख व्यक्त करना मुश्किल लग रहा है. सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में पत्नी से रोने की उम्मीद की जाती है, लेकिन जब संध्या इस स्थिति में ज्यादा रिएक्ट नहीं कर रही है. वहीं अनुष्ठान में हिस्सा लेने घर पर रिश्तेदारों इसे पोस्ट-ट्रॉमा साइकोलॉजिकल समस्या बताते है. 


पगलैट ​दो अलग दुनिया दिखाती हैं. एक है शिवेंद्र और ऊषा की बेबसी और दुःख और दूसरा है संध्या का असामान्य व्यवहार. ग्रे भाग पड़ोसियों और रिश्तेदारों से भरा हुआ है जो गपशप में अधिक रुचि रखते हैं. परिवार की निजी ज़िंदगी में दखल देने है. लड़की को  मांगलिक कहकर उसके पति की मौत के लिए दोषी ठहराते है. ऐसी आंटियों को ढूंढना बहुत मुश्किल नहीं है, जो किसी के जाने के बाद उसकी पत्नी के लिए ऐसा कहती है. वहीं एक तरफ परिवार शोक में है, संध्या अपने दोस्त नाजिया जैदी (श्रुति शर्मा) के साथ पानीपुरी  खाने के लिए कहती है जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं हो. यहां पर संध्या और नाजिया की दोस्ती को देखना बहुत प्यारा लगता है, 

 

वैसे यहा आपको बता दें कि, संध्या और आस्तिक का रिश्ता इतना रोमांटिक नहीं था, दरअसल संध्या को ये पता चल जाता है कि उसके दिवंगत पति का अफेयर पहले ऑफिस में साथ काम करने वाली आकांक्षा रॉय (सयानी गुप्ता) से था. संध्या के एक दम उलट आकांक्षा मोडर्न, इनडिपेंडेंट और अच्छे से तैयार होने वाली लड़की है. पगलैट में हमें टीपिकल कभी  सौतन, कभी सहेली वाला एंगल नहीं देखने को मिलता है. यह पूर्व-प्रेमिका और पत्नी के बीच के रिश्ते को स्वाभाविक रूप से देखना दिलचस्प है.

पगलैट हमे 13 दिनों के शोक में ले जाती है. ये फिल्म हमें संध्या के साथ सहानुभूति रखते से लेकर अपने दिवंगत पति की 50 लाख बीमा धनराशी  को लेने पर आलोचना झेलने तक की बिंदुओं की सैर कराती है. लेकिन क्या वह वास्तव में पैसे की भूखी है ? फिल्म 1 घंटे 54 मिनट में यहीं डिकोड है. 
 

पगलैट एक मध्यमवर्गीय परिवार की एक साधारण कहानी है जो अभी भी सदियों पुरानी परंपराओं और मान्यताओं में फंसी हुई है. डायरेक्टर उमेश अपनी बात कहने में बिल्कुल टाइम वेस्ट नहीं किया. पहले फ्रेम से ही, हमें कई डिफरेंट कैरेक्टर्स से परिचित कराया जाता है, जो हमारे अपने परिवारों, पड़ोस और समाज हैं. पीरियड को एक वर्जित शब्द के रूप में मानने से लेकर मुस्लिमों को हिंदू रीति-रिवाजों में भाग लेने की अनुमति नहीं देने तक, अधिकांश सामान्य सामाजिक मुद्दों को कुछ समय में निपटा दिया जाता है. हालांकि संध्या की आगे बढ़ने वाली जर्नी पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे वो अपने परिवेश को देखकर वो अपने निर्णय लेने में मजबूत होती है. 

उमेश एक दिल से फिल्म बनाते हैं और बताते है कि जब कोई महिला स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना शुरू करती हैं और जब वे परिवार की आर्थिक देखभाल करने की बात करती हैं साथ ही पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाती हैं तो कैसे उसे 'पगलैट'​कहा जाता है. हालांकि, कई जगहों पर पर फिल्म अपनी लय खो देती है. 
 

उमेश ने वास्तव में संध्या के चरित्र को विस्तृत बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है और इस पर पूरा ध्यान दिया है, वह नाज़िया और आकांक्षा जैसे अन्य दिलचस्प पात्र दिखाते है पर ये कैरेक्टर्स अचानक गायब हो जाते है. आस्तिक के माता-पिता और परिवार में आंतरिक समस्याओं के बारे में बहुत कम जानकारी, कहानी और पात्रों से जुड़ी भावनाओं को नम करती है. खामियों के बावजूद, डायरेक्टर ने एक अनकही कहानी कहने का जोखिम उठाया है, यह काबिल-ए-तारीफ है. इसके बाद उम्मीद है कि इस पर जरूर सोचा जाएंगा कि कैसे विधवाओं को भी अपने रास्ते चुनने और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है. सामाजिक हथकड़ियों को तोड़ते हुए, उमेश ने कहा कि यदि कोई महिला फैसला करती है, तो वह घर की 'मर्द' बन सकती है. 

सान्या पगलैट की असली हीरो हैं. वह संवेदनशील फिल्म को अपने कंधे पर लेकर चलती है और एक बार फिर शानदार एक्टिंग से दिल जीत लेती है. वह संध्या को प्यार, सम्मान और स्वतंत्रता की खूबसूरती से पाने की लालसा को दिखाने में कामयाब होती है. संध्या असुरक्षित है, अंदर से टूटी हुई है और समाज के खिलाफ एक लड़ाई लड़ती है जो उसे पगली कहती है. संध्या के रूप में सान्या बहुत जमी है. फिल्म में वह बचपन की एक घटना को भी याद करती है जब वह अपनी बिल्ली की मौत पर रोई थी लेकिन पति के गुजर जाने के बाद वह ऐसा नहीं कर सकी. इस बिंदु पर सान्या परफेक्ट लगी है. 
 

आशुतोष और शीबा आस्तिक के माता-पिता के रूप में जमे है. दोनों की चुप्पी ही सबसे ज्यादा बोलती हैं. सयानी कैमियो में अपना सर्वश्रेष्ठ देती है. स्क्रीन पर कम समय रहने के बावजूद उनका किरदार फिल्म को प्रभावित करता है, इससे ही पता चलता है कि सयानी कितनी शानदार अभिनेत्री हैं. श्रुति, रघुबीर और राजेश अपने छोटे किरदारों में बेहतरीन काम करते है. नताशा रस्तोगी, मेघना मलिक, शारिब हाशमी, आसिफ खान, जमील खान, सचिन चौधरी और नकुल सहदेव सहित कलाकारों की टुकड़ी काफी अच्छी है. हालांकि, बहुत सारे पात्रों के साथ जुड़ना मुश्किल हो जाता है. 

अरिजीत सिंह संगीत के जादूगर है. संगीत सूक्ष्म, प्रभावशाली और कानों को प्यारा लगने वाला है. वहीं फिल्म की फ़ोटोग्राफ़ी कमाल की है. पगलैट ​उमेश का मास्टरस्ट्रोक हो सकता था, लेकिन होली वीकेंड में इसे आसान बनाने के लिए पंच और कॉमेडी का अभाव है. इसे सान्या के प्यारे अभिनय के लिए देख सकते है. 

PeepingMoon Pagglait को 3 मूंस देता है. 
 

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